हरिद्वार | 20 जून 2026
उत्तराखंड के बहुचर्चित हरिद्वार भूमि घोटाले ने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। हरिद्वार नगर निगम द्वारा कूड़ा निस्तारण परियोजना के नाम पर कथित तौर पर बाजार मूल्य से कई गुना अधिक कीमत पर भूमि खरीदने का मामला अब प्रदेश के सबसे बड़े प्रशासनिक और वित्तीय विवादों में गिना जा रहा है। इस प्रकरण में धामी सरकार द्वारा की गई कार्रवाई को उत्तराखंड के इतिहास की सबसे बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई माना जा रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में वरिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों पर एक साथ कठोर कदम उठाए गए हैं।
करीब 54 करोड़ रुपये में खरीदी गई विवादित भूमि को लेकर शुरू हुए सवालों ने अंततः विजिलेंस जांच का रूप लिया और एक वर्ष तक चली पड़ताल के बाद कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जांच रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने तत्कालीन नगर आयुक्त के खिलाफ सेवा समाप्ति की संस्तुति और तत्कालीन जिलाधिकारी के खिलाफ गंभीर दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश कर दी है।
2022 में रखी गई थी पूरी योजना की नींव
सूत्रों और जांच में सामने आए तथ्यों के अनुसार विवादित भूमि खरीद की पूरी पृष्ठभूमि वर्ष 2022 में तैयार होने लगी थी। उस समय हरिद्वार जिले में प्रशासनिक स्तर पर भूमि संबंधी प्रक्रियाओं और प्रस्तावों को आगे बढ़ाने की शुरुआत हुई थी। बाद में यही प्रक्रिया वर्ष 2024 में नगर निगम की भूमि खरीद योजना के रूप में सामने आई।
सितंबर 2024 में हरिद्वार नगर निगम ने सराय क्षेत्र में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन परियोजना के लिए लगभग 2.307 हेक्टेयर भूमि खरीदने की प्रक्रिया शुरू की। यह भूमि डंपिंग यार्ड के समीप स्थित थी और कृषि भूमि से व्यावसायिक उपयोग में परिवर्तन की प्रक्रिया भी पूरी की गई थी।
अक्टूबर और नवंबर 2024 के दौरान भूमि का मूल्यांकन किया गया और नगर निगम ने लगभग 54 करोड़ रुपये में भूमि खरीद का सौदा अंतिम रूप दिया। इसके बाद भुगतान की प्रक्रिया पूरी कर रजिस्ट्री भी करा दी गई। हालांकि जल्द ही इस सौदे को लेकर सवाल उठने लगे कि जिस भूमि का वास्तविक बाजार मूल्य काफी कम बताया जा रहा था, उसे इतनी ऊंची कीमत पर क्यों खरीदा गया।
शिकायतों के बाद बढ़ा मामला
दिसंबर 2024 से लेकर अप्रैल 2025 तक भूमि खरीद, मूल्यांकन प्रक्रिया और प्रशासनिक अनुमोदनों को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रहीं। आरोप लगाए गए कि भूमि चयन से लेकर मूल्य निर्धारण तक कई स्तरों पर गंभीर अनियमितताएं हुईं और सरकारी धन को नुकसान पहुंचाया गया।
29 मई 2025 को शासन को प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सौंपी गई। रिपोर्ट में कई प्रक्रियागत खामियों और नियमों के उल्लंघन की बात सामने आने के बाद सरकार ने मामले को गंभीरता से लिया।
3 जून 2025 को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बड़ी कार्रवाई करते हुए दो आईएएस अधिकारियों समेत कई अधिकारियों को निलंबित कर दिया। साथ ही पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच विजिलेंस को सौंप दी गई। सरकार ने विवादित भूमि की रजिस्ट्री निरस्त करने और भुगतान की वसूली की दिशा में भी कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए।
इसके बाद 5 जून 2025 को नगर निगम ने विवादित भूमि की रजिस्ट्री रद्द कराने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का निर्णय लिया। वहीं 11 जून 2025 को विजिलेंस की टीम हरिद्वार पहुंची और विवादित भूमि का निरीक्षण करने के साथ संबंधित अधिकारियों के बयान दर्ज किए।
एक वर्ष तक चली जांच
जून 2025 से जून 2026 तक विजिलेंस ने मामले की विस्तृत जांच की। इस दौरान भूमि मूल्यांकन रिपोर्ट, फाइल नोटिंग, बैंक रिकॉर्ड, भुगतान प्रक्रिया और प्रशासनिक अनुमोदनों की गहन समीक्षा की गई। जांच एजेंसियों ने कई अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका का परीक्षण किया।
19 जून 2026 को विजिलेंस की अंतिम रिपोर्ट सामने आने के बाद सरकार ने कड़ी कार्रवाई करते हुए तत्कालीन नगर आयुक्त वरुण चौधरी के खिलाफ सेवा से बर्खास्तगी की संस्तुति की। वहीं तत्कालीन जिलाधिकारी कर्मेंद्र सिंह के विरुद्ध मेजर पेनाल्टी यानी गंभीर दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश की गई। इसके अलावा अन्य अधिकारियों के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई के आदेश जारी किए गए।
क्या हैं मुख्य आरोप
जांच एजेंसियों के अनुसार जिस भूमि को खरीदा गया वह डंपिंग यार्ड के निकट स्थित थी और परियोजना के लिए पूरी तरह उपयुक्त नहीं मानी जा रही थी। आरोप है कि भूमि का मूल्य वास्तविक बाजार दर से कहीं अधिक तय किया गया और भूमि उपयोग परिवर्तन तथा मूल्यांकन प्रक्रिया में भी गंभीर अनियमितताएं हुईं।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार भूमि खरीद की प्रक्रिया में पहले प्रस्ताव तैयार किया गया, फिर राजस्व विभाग द्वारा मूल्यांकन रिपोर्ट बनाई गई। इसके बाद नगर निगम ने भूमि खरीद प्रस्ताव को आगे बढ़ाया। फाइल नगर आयुक्त और जिलाधिकारी स्तर से गुजरने के बाद भुगतान और रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी की गई।
किस अधिकारी की क्या भूमिका
तत्कालीन नगर आयुक्त वरुण चौधरी पर आरोप है कि उन्होंने नगर निगम की ओर से भूमि खरीद प्रक्रिया को आगे बढ़ाने, प्रस्तावों को मंजूरी देने और सौदे को अंतिम रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी आधार पर उनके खिलाफ सबसे कठोर कार्रवाई की संस्तुति की गई है।
वहीं तत्कालीन जिलाधिकारी कर्मेंद्र सिंह पर आरोप है कि भूमि खरीद से संबंधित प्रशासनिक और राजस्व अनुमोदनों की निगरानी उनके अधिकार क्षेत्र में थी। जांच में उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठने के बाद सरकार ने उनके खिलाफ भी गंभीर दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश की है।
निष्कर्ष
हरिद्वार भूमि घोटाला उत्तराखंड के प्रशासनिक इतिहास के सबसे चर्चित मामलों में शामिल हो चुका है। डंपिंग यार्ड के पास स्थित भूमि की खरीद से शुरू हुआ यह विवाद अब उच्च स्तर की जवाबदेही और भ्रष्टाचार के आरोपों तक पहुंच गया है। विजिलेंस जांच के बाद हुई सख्त कार्रवाई ने स्पष्ट संकेत दिया है कि सरकार इस मामले में किसी भी स्तर पर लापरवाही या भ्रष्टाचार को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। आने वाले दिनों में मुकदमे दर्ज होने और अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों पर कानूनी कार्रवाई की संभावना भी बनी हुई है, जिससे यह मामला और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।


