विकासनगर/जौनसार-बावर | 10 अगस्त 2026
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में मानसून के दौरान प्राकृतिक आपदा के पुराने जख्म एक बार फिर सामने आने लगे हैं। विकासनगर क्षेत्र के जौनसार-बावर में अमलावा नदी पर बना पुल वर्ष 2013 की आपदा में ध्वस्त हो गया था, लेकिन करीब 13 साल बीत जाने के बाद भी ग्रामीणों को इस स्थान पर स्थायी पुल की सुविधा नहीं मिल सकी है। बारिश के दिनों में अमलावा नदी के उफान पर आने के बाद ग्रामीणों के सामने नदी पार करना जान जोखिम में डालने जैसा हो जाता है।
नराया गांव समेत आसपास के कई गांवों के लोगों की कृषि भूमि और पशुशालाएं नदी के दूसरी ओर हैं। ऐसे में रोजमर्रा के जरूरी कामों के लिए ग्रामीणों को उफनती अमलावा नदी पार करनी पड़ती है।
उफनती नदी के बीच आवाजाही बनी मजबूरी
इन दिनों लगातार बारिश के कारण अमलावा नदी का जलस्तर बढ़ा हुआ है। तेज बहाव के बावजूद ग्रामीण नदी पार करने को मजबूर हैं। कई जगह लोग एक-दूसरे का सहारा लेकर और डंडों की मदद से नदी पार करते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दौरान नदी का बहाव बेहद तेज हो जाता है। ऐसे में थोड़ी सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है। इसके बावजूद खेतों और पशुशालाओं तक पहुंचने के लिए उनके पास कोई सुरक्षित विकल्प नहीं है।
2013 की आपदा में ढह गया था पुल
ग्रामीणों के अनुसार अमलावा नदी पर बना पुल वर्ष 2013 की आपदा में बह गया था। इसके बाद क्षेत्र में कई बार आपदा और अतिवृष्टि की स्थिति बनी, जिससे नदी पर बने अन्य पुल और संपर्क मार्ग भी प्रभावित हुए।
ग्रामीणों का आरोप है कि इतने वर्षों के दौरान कई बार संबंधित विभाग और प्रशासन को पुल निर्माण की समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो सकी।
करीब एक दर्जन पुल आपदा की चपेट में आए
स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक अमलावा नदी पर पहले करीब एक दर्जन पुल और पुलिया थीं, जो अलग-अलग आपदाओं में क्षतिग्रस्त या ध्वस्त हो गईं। इन संपर्क मार्गों के बहाल नहीं होने से क्षेत्र के कई गांवों के लोग प्रभावित हैं।
पानुवा, मलेथा, उदपाल्टा, कुरोली, कोठा तारली, सैंज, सैंसा, नराया, चिबऊ, कोटि और कोरूवा समेत आसपास के गांवों के ग्रामीणों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
खेती और पशुपालन पर भी पड़ रहा असर
नदी के दूसरी ओर कई ग्रामीण परिवारों की कृषि भूमि और पशुशालाएं हैं। सलगा, बोहा और नराया गांव के करीब 25 परिवारों की पशुशालाएं और कृषि भूमि नदी के पार बताई गई हैं।
पुल नहीं होने के कारण ग्रामीणों को अपने खेतों तक पहुंचने और पशुओं की देखभाल के लिए जोखिम उठाना पड़ता है। बारिश के दौरान समस्या और गंभीर हो जाती है, क्योंकि नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ सुरक्षित तरीके से पार करना लगभग असंभव हो जाता है।
कई बार शिकायत के बावजूद नहीं हुआ समाधान
नराया गांव के पूर्व प्रधान श्रीचंद तोमर का कहना है कि ग्रामीण लंबे समय से पुल निर्माण की मांग कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि संबंधित अधिकारियों को कई बार समस्या से अवगत कराया गया है, लेकिन अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
उनके अनुसार, उपजिलाधिकारी स्तर के अधिकारियों को भी समस्या की जानकारी है, फिर भी ग्रामीणों को सुरक्षित आवाजाही की सुविधा नहीं मिल पाई है।
प्रशासन ने दिया कार्रवाई का भरोसा
एसडीएम कालसी प्रेमलाल ने कहा कि क्षतिग्रस्त पुलों और नए पुलों के निर्माण के संबंध में संबंधित विभाग को निर्देशित किया जाएगा। प्रशासन का कहना है कि क्षेत्र की स्थिति को देखते हुए आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
मानसून में बढ़ जाता है खतरा
अमलावा नदी का जलस्तर सामान्य दिनों में ग्रामीणों के लिए बड़ी बाधा नहीं बनता, लेकिन मानसून के दौरान बारिश बढ़ते ही नदी का स्वरूप बदल जाता है। तेज बहाव और फिसलन के कारण नदी पार करना बेहद जोखिमपूर्ण हो जाता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक पुल का स्थायी निर्माण नहीं होता, तब तक प्रशासन को कम से कम बरसात के मौसम में वैकल्पिक सुरक्षित मार्ग या अस्थायी आवाजाही की व्यवस्था करनी चाहिए।
ग्रामीणों को अब भी स्थायी समाधान का इंतजार
करीब 13 साल पहले आई आपदा में ध्वस्त हुआ पुल आज भी ग्रामीणों के लिए अधूरी विकास व्यवस्था का प्रतीक बना हुआ है। हर मानसून में नदी का बढ़ता जलस्तर उन्हें पुराने संकट की याद दिलाता है और सुरक्षित आवाजाही का सवाल फिर सामने खड़ा हो जाता है।
निष्कर्ष
जौनसार-बावर के अमलावा नदी क्षेत्र में पुल की कमी केवल आवाजाही की समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीणों की सुरक्षा, कृषि और पशुपालन से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। 2013 की आपदा के वर्षों बाद भी स्थायी पुल का निर्माण नहीं होना यह सवाल खड़ा करता है कि आपदा प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्निर्माण की योजनाएं जमीन पर कितनी प्रभावी हैं। अब ग्रामीणों को प्रशासन के आश्वासन से आगे बढ़कर स्थायी पुल निर्माण की ठोस कार्रवाई का इंतजार है, ताकि उन्हें हर बरसात में जान जोखिम में डालकर नदी पार न करनी पड़े।


