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Army Day Special: उत्तराखंड का वीर कुकरेती परिवार, 1971 के युद्ध में एक साथ लड़े पांच भाई, पीढ़ी-दर-पीढ़ी राष्ट्रसेवा की मिसाल

देहरादून | 15 जनवरी 2026

सेना दिवस के अवसर पर जब देश अपने वीर जवानों को नमन कर रहा है, तब उत्तराखंड की राजधानी देहरादून का कुकरेती परिवार राष्ट्रभक्ति, त्याग और शौर्य की एक अद्वितीय गाथा के रूप में सामने आता है। यह वह परिवार है, जिसके पांच बेटों ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना के अलग-अलग मोर्चों पर डटकर देश की रक्षा की और इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कराया।


रणभूमि से उपजा अदम्य संकल्प

कुकरेती परिवार की कहानी केवल युद्ध की नहीं, बल्कि उस संकल्प की है, जहां निजी सुख, परिवार और भविष्य को पीछे छोड़कर मातृभूमि सर्वोपरि रही। 1971 के ऐतिहासिक युद्ध में इस परिवार के पांचों भाई भारतीय सेना में कार्यरत थे।
तीन भाई राजपूत रेजिमेंट में सीधे मोर्चे पर तैनात थे, जबकि दो भाई ईएमई (इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स) कोर में रहकर तकनीकी और रणनीतिक जिम्मेदारियां निभा रहे थे। अलग-अलग भूमिकाओं में रहते हुए भी सभी का उद्देश्य एक ही था—भारत की विजय।


युद्ध से सकुशल लौटे, वीरता की मिसाल बने

युद्ध समाप्ति के बाद पांचों भाई सकुशल स्वदेश लौटे। समय के साथ मेजर जगदीश प्रसाद कुकरेती, मेजर जनरल प्रेम लाल कुकरेती, नायक सूबेदार सोहनलाल कुकरेती और अन्य सदस्यों ने भी सेना में रहते हुए देश की सेवा की।
आज इस परिवार की वीर गाथा का सजीव साक्ष्य हैं रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती, जो स्वयं 1971 के युद्ध के प्रत्यक्ष गवाह रहे हैं।


लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती की जुबानी युद्ध की कहानी

शौर्य चक्र सहित पांच वीरता पुरस्कार और अनेक मेडल प्राप्त कर चुके लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती बताते हैं कि युद्ध से पहले पाकिस्तानी समर्थित मुक्ति वाहिनी बांग्लादेश की ओर से भारत की सीमाओं की तरफ बढ़ रही थी।
भारतीय सेना त्रिपुरा के धर्मनगर पहुंची और दस ग्राम क्षेत्र में कैंप स्थापित किया गया। इस दौरान पाकिस्तानी सेना लगातार रेलवे लाइन को उड़ाकर भारतीय सेना की रसद आपूर्ति बाधित करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन भारतीय जवानों ने हर साजिश को नाकाम कर दिया।


दुश्मन की साजिश नाकाम, रेकी से मिली जीत

एक दिसंबर 1971 को पकड़े गए पाकिस्तानी इंटेलिजेंस के सूबेदार ने खुलासा किया कि भारत के भीतर भी पाकिस्तानी खबरी सक्रिय हैं। इसके बाद भारतीय सेना ने रेकी अभियान तेज किया।
लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती और उनकी टीम ने दुश्मन की तैनाती और रणनीति से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाकर अपनी ब्रिगेड तक पहुंचाईं, जिससे आगे की सैन्य कार्रवाई को मजबूती मिली।


भूख, थकान और कठिनाइयों के बीच विजय यात्रा

कुकरेती बताते हैं कि युद्ध के दौरान उनकी टुकड़ी को तीन दिन तक बिना खाए-पिए करीब 93 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। कई बार ऐसा भी हुआ जब पांच दिन बाद ताजा भोजन नसीब हुआ।
इसके बावजूद सैनिकों का हौसला अडिग रहा। गाजीपुर, क्लोरा, हलाई चारा, फेंचुगंज होते हुए अंततः ढाका तक भारतीय सेना ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए विजय पताका फहराई।


पीढ़ी-दर-पीढ़ी वीरता की परंपरा

कुकरेती परिवार की राष्ट्रसेवा 1971 के युद्ध तक सीमित नहीं रही। इस परिवार को अब तक चार बड़े वीरता सम्मान मिल चुके हैं।
मेजर जनरल प्रेम लाल कुकरेती को सेना मेडल, लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती को शौर्य चक्र, उनके पुत्र लेफ्टिनेंट कर्नल कार्तिकेय कुकरेती को सेना मेडल और दूसरे पुत्र लेफ्टिनेंट कर्नल अर्थ कुकरेती को ‘मेंशन इन डिस्पैच’ से सम्मानित किया गया है।


निष्कर्ष

देहरादून का कुकरेती परिवार केवल एक परिवार नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति की जीवंत परंपरा है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाई गई सेना सेवा, बलिदान और शौर्य की यह कहानी 1971 के युद्ध की गौरवगाथा को संजोए हुए है। सेना दिवस के अवसर पर यह परिवार पूरे देश के लिए प्रेरणा, गर्व और सम्मान का प्रतीक बनकर सामने आता है।

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