देहरादून, उत्तराखंड | मंगलवार, 26 मई 2026
राजधानी देहरादून की कैंट विधानसभा सीट एक बार फिर राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में आ गई है। वर्ष 1985 से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ रही यह सीट अब आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर पार्टी के भीतर नई हलचल पैदा कर रही है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि भाजपा इस बार भी कपूर परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाएगी या फिर किसी नए चेहरे पर दांव खेलेगी।
कैंट विधानसभा में लंबे समय से भाजपा का दबदबा कायम रहा है और पार्टी यहां लगातार जीत दर्ज करती आई है। लेकिन मौजूदा विधायक सविता कपूर की बढ़ती उम्र और संगठन में सक्रिय नए नेताओं की दावेदारी ने राजनीतिक समीकरणों को दिलचस्प बना दिया है।
देहरादून कैंट सीट का राजनीतिक इतिहास भाजपा के वरिष्ठ नेता स्वर्गीय हरबंस कपूर के नाम से जुड़ा रहा है। उत्तराखंड गठन से पहले जब यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, तब वर्ष 1985 में देहराखास सीट से हरबंस कपूर पहली बार विधायक चुने गए थे।
इसके बाद उन्होंने लगातार इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी और कई चुनावों में भाजपा को बड़ी जीत दिलाई। क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी को 22.89 प्रतिशत वोटों के भारी अंतर से हराया था।
हरबंस कपूर के निधन के बाद वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उनकी पत्नी सविता कपूर को उम्मीदवार बनाया। सहानुभूति लहर और कपूर परिवार की मजबूत राजनीतिक पकड़ का लाभ भाजपा को मिला और सविता कपूर ने अपने पति से भी अधिक अंतर से जीत दर्ज की।
उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी सूर्यकांत धस्माना को 27.36 प्रतिशत वोटों के अंतर से हराया था। वर्ष 2022 के चुनाव में कैंट विधानसभा क्षेत्र में कुल 77,113 मतदाता थे, जिनमें से 56.89 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया।
भाजपा प्रत्याशी सविता कपूर को 45,492 वोट मिले, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार सूर्यकांत धस्माना को 24,554 मत प्राप्त हुए थे।
अब जैसे-जैसे आगामी चुनाव नजदीक आ रहे हैं, भाजपा के भीतर इस सीट को लेकर गतिविधियां तेज हो गई हैं। पार्टी के कई नेता लंबे समय से क्षेत्र में सक्रिय होकर अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं।
भाजपा प्रदेश मंत्री आदित्य चौहान लगातार क्षेत्र में जनसंपर्क और संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। इसके अलावा भाजपा नेता विनय गोयल, जोगेंद्र पुंडीर और महानगर अध्यक्ष सिद्धार्थ अग्रवाल भी कैंट सीट पर अपनी राजनीतिक मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि पार्टी स्वर्गीय हरबंस कपूर के पुत्र अमित कपूर को आगे बढ़ाकर राजनीतिक विरासत को कायम रख सकती है।
कैंट विधानसभा का सामाजिक और जातीय समीकरण भी चुनावी रणनीति में अहम भूमिका निभाता है। यह क्षेत्र सेना और पूर्व सैनिकों की बड़ी आबादी वाला क्षेत्र माना जाता है।
गढ़ी कैंट, डाकरा और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक और उनके परिवार निवास करते हैं। इसके अलावा गोरखा समुदाय का भी इस सीट पर प्रभाव माना जाता है।
राजधानी क्षेत्र होने के कारण यहां पर्वतीय मूल के मतदाताओं, विशेषकर ठाकुर और ब्राह्मण समाज की भी अच्छी संख्या है। साथ ही व्यापारी वर्ग, पंजाबी समुदाय और वैश्य समाज भी चुनावी परिणामों को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण वोट बैंक माने जाते हैं।
अल्पसंख्यक समुदाय, खासकर मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी भी करीब आठ प्रतिशत बताई जाती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने पिछले कई दशकों से इन सभी सामाजिक वर्गों के बीच मजबूत पकड़ बनाए रखी है। यही कारण है कि कांग्रेस सहित अन्य दल इस सीट पर भाजपा के किले को भेदने में अब तक सफल नहीं हो पाए हैं।
हालांकि इस बार पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती उम्मीदवार चयन को लेकर होगी। भाजपा को यह तय करना होगा कि वह परंपरागत राजनीतिक विरासत को प्राथमिकता देती है या बदलते राजनीतिक माहौल में किसी नए चेहरे को आगे लाकर नया संदेश देना चाहती है।
निष्कर्ष
देहरादून कैंट विधानसभा सीट भाजपा के लिए केवल एक चुनावी क्षेत्र नहीं, बल्कि दशकों पुरानी राजनीतिक विरासत और संगठनात्मक मजबूती का प्रतीक रही है। हरबंस कपूर परिवार की पकड़ के बीच अब नए दावेदारों की सक्रियता ने मुकाबले को रोचक बना दिया है। आने वाले समय में भाजपा का उम्मीदवार चयन इस सीट की राजनीति की दिशा तय करेगा और यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी अनुभव और विरासत पर भरोसा करती है या नए नेतृत्व को मौका देती है।


