देहरादून | 14 जनवरी 2026
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से एक दिल को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। त्यूणी क्षेत्र में तीन श्रमिकों की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने न केवल तीन परिवारों की दुनिया उजाड़ दी, बल्कि पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। महज 21 साल की उम्र में कुसुम का सुहाग उजड़ गया, उसकी गोद में दूधमुंहा बच्चा है और हाथों में सिर्फ न्याय की उम्मीद।
यह दर्दनाक घटना देहरादून जनपद की त्यूणी तहसील के भूठ गांव की है, जहां 6 जनवरी को भवन निर्माण कार्य के लिए गए तीन मजदूरों की रहस्यमयी हालात में मौत हो गई। मृतकों में 35 वर्षीय प्रकाश और 25 वर्षीय संजय (दोनों सगे भाई, निवासी डिरनाड) तथा 25 वर्षीय संदीप (निवासी पटियूड) शामिल हैं। तीनों मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवारों का पालन-पोषण कर रहे थे।
मृतकों की पत्नियां—21 वर्षीय कुसुम, 28 वर्षीय दिव्याक्षी और 23 वर्षीय दीपिका—अब न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। मंगलवार को तीनों महिलाएं अपने परिजनों के साथ देहरादून पहुंचीं। पहले उन्होंने गढ़वाल परिक्षेत्र के महानिरीक्षक से मुलाकात कर अपनी पीड़ा साझा की, इसके बाद उत्तरांचल प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता कर पूरे मामले को सार्वजनिक किया।
आंसुओं के बीच महिलाओं ने प्रशासन की आधिकारिक थ्योरी को सिरे से खारिज कर दिया। उनका कहना है कि उनके पतियों की मौत को एलपीजी गैस रिसाव बताया जा रहा है, लेकिन जब उन्होंने शव देखे तो सच्चाई कुछ और ही बयान कर रही थी। महिलाओं का दावा है कि मृतकों के शरीर पर साफ चोट के निशान थे, जो किसी दुर्घटना की नहीं बल्कि हिंसा की ओर इशारा करते हैं।
ग्राम प्रधान की भूमिका पर सवाल
तीनों श्रमिक भूठ गांव के ग्राम प्रधान अमित राणा के घर चल रहे निर्माण कार्य में लगे हुए थे। आरोप है कि रहने के लिए उन्हें गांव से दूर एक पुराने स्कूल के कमरे में ठहराया गया था। अब मृतकों की पत्नियों ने ग्राम प्रधान की भूमिका पर गंभीर संदेह जताया है और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
महिलाओं का आरोप है कि घटना के बाद तहसील और राजस्व पुलिस स्तर पर उन्हें कोई सहयोग नहीं मिला। बाद में मामला नियमित पुलिस को सौंप दिया गया, लेकिन अब भी उन्हें न्याय की उम्मीद कमजोर पड़ती नजर आ रही है। अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले इन परिवारों ने सिस्टम पर उदासीनता का आरोप लगाते हुए इंसाफ की गुहार लगाई है।
तीन घरों के चूल्हे एक साथ ठंडे पड़ गए हैं। तीन महिलाएं विधवा हो चुकी हैं और मासूम बच्चों का भविष्य अंधेरे में चला गया है। जिन हाथों में मेहनत की ताकत थी, आज उन्हीं हाथों की तस्वीरें आंसुओं में भीग रही हैं।
निष्कर्ष:
त्यूणी की यह घटना केवल तीन मौतों का मामला नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक संवेदनशीलता, सामाजिक जिम्मेदारी और न्याय व्यवस्था की परीक्षा भी है। अगर समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि क्या गरीबों की मौत भी सिर्फ एक “दुर्घटना” बनकर फाइलों में दफन हो जाएगी, या उन्हें सच में इंसाफ मिलेगा।


