देहरादून | 11 अगस्त 2026
उत्तराखंड के करीब 15 हजार शिक्षकों के लिए राहत की उम्मीद जगी है। लंबे समय से शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET को लेकर चल रही असमंजस की स्थिति के बीच राज्य सरकार अब उत्तर प्रदेश की तर्ज पर अलग से TET कराने की तैयारी कर रही है। शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने अधिकारियों को पूरे मामले का अध्ययन कर प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए हैं।
यदि शासन स्तर से प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो उन शिक्षकों के लिए अलग TET आयोजित किया जा सकता है, जिनकी नियुक्तियां मौजूदा TET व्यवस्था लागू होने से पहले हुई थीं।
शिक्षा मंत्री के सामने शिक्षकों ने रखा मामला
राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ की प्रांतीय तदर्थ समिति के सदस्य दिगम्बर सिंह नेगी के अनुसार, शिक्षकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने इस मुद्दे को लेकर शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत से मुलाकात की।
प्रतिनिधिमंडल ने मंत्री के सामने उन शिक्षकों की समस्या रखी, जिनकी नियुक्ति TET अनिवार्य किए जाने से पहले तत्कालीन सेवा नियमों और निर्धारित योग्यता के आधार पर हुई थी।
शिक्षकों का कहना है कि नियुक्ति के समय जो सेवा शर्तें लागू थीं, उन्होंने उनका पालन किया था। ऐसे में अब वर्षों की सेवा के बाद TET की अनिवार्यता लागू किए जाने से उनके सामने नई परेशानी खड़ी हो गई है।
अधिकारियों को यूपी की तर्ज पर प्रस्ताव बनाने के निर्देश
शिक्षा मंत्री ने इस मामले में उत्तराखंड बोर्ड के सचिव विनोद ढौंढियाल और प्रारंभिक शिक्षा निदेशक कुंवर सिंह रावत को उत्तर प्रदेश की तर्ज पर प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए हैं।
अधिकारियों को पूरे मामले का अध्ययन करने के साथ ऐसा प्रस्ताव तैयार करना है, जिसे शासन के सामने भेजा जा सके। इसके बाद शासन स्तर से निर्णय लिया जाएगा कि संबंधित शिक्षकों के लिए अलग से TET परीक्षा कराई जाएगी या उन्हें किसी अन्य व्यवस्था के तहत राहत दी जाएगी।
23 अगस्त 2010 की अधिसूचना का दिया हवाला
शिक्षकों ने अपनी मांग के समर्थन में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद यानी NCTE की 23 अगस्त 2010 की अधिसूचना का हवाला दिया है।
शिक्षकों के मुताबिक इस अधिसूचना में कक्षा एक से आठ तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए TET को आवश्यक योग्यता के रूप में निर्धारित किया गया था। इसके बाद नियुक्त होने वाले शिक्षकों के लिए TET अनिवार्य व्यवस्था का हिस्सा बन गया।
शिक्षकों का कहना है कि 23 अगस्त 2010 के बाद नियुक्त हुए शिक्षक TET उत्तीर्ण कर चुके हैं, लेकिन उससे पहले नियुक्त शिक्षकों की भर्ती उस समय लागू सेवा शर्तों और योग्यता के आधार पर हुई थी।
53-54 साल की उम्र में TET को लेकर चिंता
शिक्षकों की सबसे बड़ी चिंता उनकी उम्र और लंबे सेवाकाल को लेकर है। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि इनमें से कई शिक्षक अब 53 से 54 वर्ष की उम्र तक पहुंच चुके हैं।
शिक्षकों का तर्क है कि जब उनकी नियुक्ति के समय TET अनिवार्य नहीं था और उन्होंने तत्कालीन नियमों के अनुसार नौकरी हासिल की थी, तो कई वर्षों की सेवा के बाद उनसे TET कराने की अपेक्षा करना उनके लिए कठिन और अन्यायपूर्ण है।
शिक्षकों ने सरकार से मांग की है कि उन्हें TET से छूट दी जाए या उनकी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अलग से परीक्षा की व्यवस्था की जाए।
प्रस्ताव शासन को भेजे जाने के बाद होगा अंतिम फैसला
उत्तराखंड बोर्ड के सचिव विनोद ढौंढियाल के मुताबिक शिक्षा मंत्री ने संबंधित शिक्षकों के लिए अलग से TET कराने के संबंध में प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए हैं।
उन्होंने बताया कि विभागीय स्तर पर प्रस्ताव तैयार करके शासन को भेजा जाएगा। इसके बाद शासनादेश जारी होने पर ही अलग से TET कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी।
इसका मतलब साफ है कि फिलहाल अलग TET कराने का अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। अभी विभागीय स्तर पर प्रस्ताव तैयार किया जाना बाकी है और उसके बाद शासन की मंजूरी महत्वपूर्ण होगी।
शिक्षकों में फैसले से जगी उम्मीद
शिक्षा मंत्री के निर्देश के बाद संबंधित शिक्षकों में उम्मीद बढ़ी है। लंबे समय से इस मुद्दे को लेकर राहत की मांग कर रहे शिक्षक अब सरकार के अगले कदम का इंतजार कर रहे हैं।
यदि उत्तर प्रदेश की तर्ज पर अलग TET कराने का निर्णय होता है तो इससे उन हजारों शिक्षकों को राहत मिल सकती है, जिनकी नियुक्तियां TET व्यवस्था लागू होने से पहले हुई थीं।
निष्कर्ष
उत्तराखंड में करीब 15 हजार शिक्षकों से जुड़े TET विवाद में सरकार की पहल के बाद समाधान की उम्मीद बढ़ी है। शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने अधिकारियों को उत्तर प्रदेश की तर्ज पर अलग TET कराने के लिए प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है और प्रस्ताव को शासन की मंजूरी मिलना जरूरी होगा। अब शिक्षकों की नजर सरकार के आगामी निर्णय और शासनादेश पर टिकी है।


