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हरीश रावत के बयान से गरमाई उत्तराखंड की राजनीति, पुराने साथी ही बने सबसे बड़े आलोचक

2017 की हार का बदला लेने की बात पर कांग्रेस और भाजपा नेताओं के तीखे वार, पार्टी के भीतर भी बढ़ी हलचल

देहरादून | 11 मई 2026

उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत केंद्र में आ गए हैं। 2017 विधानसभा चुनाव की हार का बदला लेने संबंधी उनके हालिया बयान ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। खास बात यह है कि इस बार केवल भाजपा ही नहीं, बल्कि कभी उनके बेहद करीबी रहे पुराने सहयोगी भी उन पर खुलकर हमला बोल रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरीश रावत का यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब कांग्रेस राज्य में लगातार दो विधानसभा चुनाव हार चुकी है और पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष की आवाजें तेज होती जा रही हैं।


2017 की हार अब भी हरीश रावत के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चोट

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2017 कांग्रेस के लिए बेहद निराशाजनक साबित हुआ था। उस समय हरीश रावत के नेतृत्व में पार्टी को बड़े पैमाने पर दल-बदल का सामना करना पड़ा और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक यही कारण है कि हरीश रावत आज भी उस हार को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक पीड़ा मानते हैं। हालांकि कांग्रेस को 2022 विधानसभा चुनाव में भी हार झेलनी पड़ी थी, लेकिन अपने हालिया बयान में उन्होंने उस चुनाव का उल्लेख नहीं किया।

इससे यह संकेत मिल रहा है कि वह 2017 की परिस्थितियों को असाधारण और राजनीतिक रूप से अधिक गंभीर मानते हैं।


पुराने साथी ही अब कर रहे सबसे तीखे हमले

हरीश रावत के बयान के बाद सबसे तीखी प्रतिक्रिया भाजपा विधायक किशोर उपाध्याय की ओर से आई। कभी कांग्रेस में हरीश रावत के बेहद करीबी माने जाने वाले किशोर उपाध्याय अब भाजपा में हैं और उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री पर सीधा हमला बोला।

किशोर उपाध्याय ने कहा कि जब तक हरीश रावत सक्रिय राजनीति में बने रहेंगे, तब तक उत्तराखंड में कांग्रेस की सत्ता में वापसी संभव नहीं है।

उन्होंने आरोप लगाया कि हरीश रावत की कार्यशैली ने कई नेताओं के राजनीतिक करियर को नुकसान पहुंचाया और पार्टी संगठन को कमजोर किया।


कांग्रेस के भीतर बढ़ रही गुटबाजी की चर्चा

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर लंबे समय से खींचतान जारी है।

हरीश रावत के हालिया बयान ने एक बार फिर पार्टी के अंदर मौजूद गुटबाजी को उजागर कर दिया है। कई ऐसे नेता, जो कभी उनके राजनीतिक सहयोगी रहे, अब उनसे दूरी बना चुके हैं।

रंजीत रावत सहित कई नेताओं द्वारा समय-समय पर सार्वजनिक रूप से विरोध जताना यह संकेत देता है कि कांग्रेस फिलहाल एकजुटता के संकट से जूझ रही है।


भाजपा ने उम्र और राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी साधा निशाना

कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने भी हरीश रावत पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि उनकी राजनीतिक जिद अब एक बच्चे जैसी हो गई है।

उन्होंने कहा कि हरीश रावत अब राजनीति के उस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं, जहां सक्रिय राजनीति में उनके लिए बहुत अधिक संभावनाएं नहीं बची हैं।

सुबोध उनियाल ने उन्हें “खोखला कारतूस” बताते हुए कहा कि न तो उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक जमीन बची है और न ही कांग्रेस के लिए कोई ठोस भविष्य दिखाई देता है।


कांग्रेस नेताओं ने किया बचाव

भाजपा के हमलों के बीच कांग्रेस के कुछ नेता अब भी हरीश रावत के अनुभव और राजनीतिक पकड़ को पार्टी के लिए महत्वपूर्ण मान रहे हैं।

कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि राजनीति में संभावनाएं कभी समाप्त नहीं होतीं। समय बदलने के साथ परिस्थितियां भी बदलती हैं और कई बार ऐसे नेता भी वापसी करते हैं जिन्हें राजनीतिक रूप से खत्म मान लिया जाता है।

धस्माना का बयान कांग्रेस के उस वर्ग की सोच को दर्शाता है, जो अब भी मानता है कि हरीश रावत राज्य की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा सकते हैं।


2016 के दल-बदल की यादें फिर हुईं ताजा

हरीश रावत के बयान के बाद एक बार फिर 2016 के राजनीतिक घटनाक्रम की चर्चा शुरू हो गई है, जब कांग्रेस में बड़े पैमाने पर बगावत और दल-बदल देखने को मिला था।

उस दौर की राजनीतिक घटनाएं आज भी कांग्रेस के भीतर विवाद और असंतोष का विषय बनी हुई हैं। पार्टी के कई नेता अब पुराने घटनाक्रमों को याद दिलाकर हरीश रावत की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह बयान कहीं न कहीं हरीश रावत की राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश भी माना जा रहा है।


निष्कर्ष

उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत अब भी एक बड़ा नाम हैं, लेकिन उनके हालिया बयान ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस के भीतर उनके समर्थन और विरोध दोनों मजबूत रूप में मौजूद हैं। एक तरफ भाजपा उनके बयान को कांग्रेस की कमजोरी के तौर पर पेश कर रही है, वहीं पार्टी के अंदर भी नेतृत्व को लेकर असमंजस और असंतोष दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि हरीश रावत अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत कर पाते हैं या कांग्रेस के भीतर बढ़ता विरोध उनके लिए नई चुनौती बनता है।

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