देहरादून | 10 सितंबर 2026
उत्तराखंड के जंगलों की सुरक्षा व्यवस्था को आधुनिक तकनीक से मजबूत करने की दिशा में हल्द्वानी वन प्रभाग ने एक अहम पहल की है। अब जंगलों में संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने के लिए वनकर्मियों को केवल गश्त पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। वन प्रभाग ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI आधारित फॉरेस्ट अकॉस्टिक सर्विलांस सिस्टम का सफल प्रदर्शन किया है। इसे जंगल का डिजिटल कान कहा जा रहा है।
इस तकनीक की मदद से जंगल में होने वाली अलग-अलग आवाजों की पहचान की जाएगी। चेनसॉ से पेड़ काटने, कुल्हाड़ी चलने, गोली चलने, वाहन गुजरने और इंसानी गतिविधियों जैसी आवाजें सेंसर की पकड़ में आते ही सिस्टम उनका विश्लेषण करेगा। संदिग्ध आवाज की पहचान होने पर इसकी सूचना वन विभाग के कंट्रोल रूम तक पहुंचाई जाएगी।
जंगल में लगे सेंसर लगातार सुनेंगे आसपास की आवाजें
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत जंगल के संवेदनशील हिस्सों में ध्वनिक सेंसर लगाए जाएंगे। ये सेंसर आसपास होने वाली आवाजों को लगातार रिकॉर्ड करेंगे। इसके बाद AI तकनीक इन आवाजों का विश्लेषण कर यह पहचानने का प्रयास करेगी कि आवाज सामान्य वन गतिविधि से जुड़ी है या किसी संदिग्ध गतिविधि का संकेत है।
इस तकनीक को स्थानीय वन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों में निगरानी को मजबूत करना है, जहां अवैध पेड़ कटान, शिकार या लकड़ी तस्करी जैसी गतिविधियों की आशंका रहती है।
चेनसॉ और गोली की आवाज पकड़ने में सक्षम
AI आधारित सिस्टम को कई महत्वपूर्ण आवाजों की पहचान के लिए तैयार किया गया है। इनमें चेनसॉ चलने, कुल्हाड़ी से पेड़ काटने, गोली चलने, वाहनों की आवाज और इंसानी गतिविधियों से जुड़ी ध्वनियां शामिल हैं।
यदि किसी जंगल क्षेत्र में पेड़ काटने या शिकार जैसी गतिविधि होती है और उससे जुड़ी आवाज सेंसर की सीमा में आती है, तो सिस्टम उसका स्थानीय स्तर पर विश्लेषण करेगा। संदिग्ध गतिविधि की पुष्टि होने पर आगे की सूचना वायरलेस नेटवर्क के माध्यम से कंट्रोल रूम तक भेजी जा सकेगी।
इससे वन विभाग को घटना की जानकारी अपेक्षाकृत जल्द मिलने की उम्मीद है और संबंधित क्षेत्र में टीम भेजकर कार्रवाई करना आसान होगा।
LoRa नेटवर्क बनेगा सूचना पहुंचाने का माध्यम
इस सिस्टम की एक खास विशेषता इसका लॉन्ग रेंज LoRa आधारित वायरलेस नेटवर्क है। इसके माध्यम से सेंसर से प्राप्त जानकारी को वन विभाग के कंट्रोल रूम तक भेजा जाएगा।
इसका सबसे बड़ा फायदा उन वन क्षेत्रों में मिल सकता है, जहां मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं है। सामान्य मोबाइल कनेक्टिविटी पर निर्भर रहने के बजाय LoRa नेटवर्क के जरिए सेंसर से अलर्ट भेजने की व्यवस्था की जा रही है।
सौर ऊर्जा से चलेगा सिस्टम
दूरदराज के जंगलों में बिजली की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती होती है। इसे ध्यान में रखते हुए इस निगरानी प्रणाली को सौर ऊर्जा और रिचार्जेबल बैटरी से संचालित करने की योजना है।
इससे ऐसे दुर्गम वन क्षेत्रों में भी उपकरण लंबे समय तक काम कर सकेंगे, जहां बिजली की नियमित सुविधा नहीं है। मोबाइल नेटवर्क की अनुपलब्धता के बावजूद वायरलेस नेटवर्क के जरिए सूचना भेजे जाने की व्यवस्था इस तकनीक को और उपयोगी बनाती है।
कम लागत में तैयार की गई तकनीक
हल्द्वानी फॉरेस्ट डिवीजन के डीएफओ कुंदन कुमार ने विशेषज्ञों की मदद से इस सिस्टम को तैयार कराया है। खास बात यह है कि इसे अपेक्षाकृत कम बजट में विकसित किया गया है। फिलहाल इसका इस्तेमाल हल्द्वानी वन प्रभाग की एक रेंज में किया गया है और इसके प्रदर्शन के आधार पर आगे विस्तार की संभावनाएं देखी जा रही हैं।
वन विभाग की ओर से इसकी विस्तृत रिपोर्ट वन मुख्यालय को भेजी जा रही है। रिपोर्ट में तकनीक के उपयोग, इसके फायदे और भविष्य में इसे दूसरे क्षेत्रों तक बढ़ाने की संभावनाओं का उल्लेख किया जाएगा।
वन्यजीवों की गतिविधियों पर भी रखी जा सकेगी नजर
यह सिस्टम केवल अवैध गतिविधियों का पता लगाने तक सीमित नहीं रहेगा। AI तकनीक के माध्यम से अलग-अलग वन्यजीवों की आवाजों की पहचान करने की संभावना भी है।
इससे किसी क्षेत्र में मौजूद वन्यजीवों की गतिविधियों, उनके आवागमन और उनके रहने वाले इलाकों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी जुटाने में मदद मिल सकती है। लंबे समय तक एकत्र होने वाले ध्वनि डेटा का इस्तेमाल जैव विविधता की निगरानी और वन्यजीव संरक्षण की योजनाओं में भी किया जा सकता है।
पारंपरिक गश्त के साथ तकनीक का सहारा
अब तक जंगलों में संदिग्ध गतिविधियों का पता लगाने के लिए वनकर्मियों की गश्त एक प्रमुख माध्यम रही है। नई व्यवस्था में तकनीक इस निगरानी व्यवस्था को अतिरिक्त सहारा देगी। सेंसर किसी संभावित घटना की जानकारी पहले दे सकते हैं, जिसके आधार पर वनकर्मी संबंधित स्थान तक पहुंचकर स्थिति की जांच कर सकेंगे।
यदि इसका प्रयोग बड़े स्तर पर सफल रहता है तो उत्तराखंड के अन्य संवेदनशील वन क्षेत्रों में भी AI आधारित ध्वनिक निगरानी व्यवस्था लागू करने पर विचार किया जा सकता है।
निष्कर्ष
हल्द्वानी वन प्रभाग की यह पहल जंगलों की सुरक्षा में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। AI, ध्वनिक सेंसर और LoRa नेटवर्क के संयोजन से ऐसे इलाकों में भी निगरानी मजबूत करने की कोशिश की जा रही है, जहां मोबाइल नेटवर्क और बिजली जैसी सुविधाएं सीमित हैं। फिलहाल सिस्टम के प्रदर्शन और रिपोर्ट के आधार पर आगे की रणनीति तय होगी। अगर प्रयोग सफल रहा तो यह तकनीक अवैध कटान और शिकार पर निगरानी के साथ-साथ वन्यजीवों की गतिविधियों को समझने में भी उपयोगी साबित हो सकती है।



